भारतेन्दु के पठित छन्दों का भावार्थ : Bharatendu Ke Pathit Chhandon Ke Bhavarth

भारतेन्दु के पठित छन्दों का भावार्थ : Bharatendu Ke Pathit Chhandon Ke Bhavarth

‘प्रेम – माधुरी’ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा मौज और तरंग में कही गई रसभरी उक्तियों का एक ऐसा गुलदस्ता माना गया है जिसमें अनेक ऐसे चित्र देखे जा सकते हैं जिनमें कहीं प्रेमगर्विता स्वकीया नायिका की अन्तर्दशा, हाव-भाव, क्रिया-कलापों आदि की सजीवता दृष्टिगोचर होती है तो कहीं परकीया नायिका की छाया डोलती हुई दृष्टिगत होती है। 

‘प्रेम-माधुरी’ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित उनका एक शृंगारपरक काव्य है जिसमें उनके प्रेमभावपूर्ण रचनाएँ संग्रहित हैं जिनमें उनकी विशुद्ध अनुभूति और प्रबुद्ध कल्पनाओं का सुन्दर सामंजस्य दृष्टिगत होता है। इस काव्य में उन्होंने अपनी जीवनानुभूतियों को अत्यंत ही सरल एवं सहज ढंग से प्रस्तुत किया है। इस काव्य के अन्तर्गत कवि ने प्रेम को जीवन दर्शन के रूप में ग्रहण करते हुए उसके व्यापक एवं विशद स्वरूप का अत्यंत ही स्वाभाविक चित्रण किया है। 

विरहिणी ब्रजवासी गोपियाँ कहती हैं कि उनका जन्म ही क्यों हुआ जो उन्हें विरहिणी बनकर विरह-दुःख झेलने के लिए विवश होना पड़ा। यह शायद विधाता का लिखा है जो उसे दुख देखना पड़ रहा है और इसीलिए उसे ठगा गया है। विरहिणी गोपियाँ कहती हैं कि टोकने पर अमंगल होता है, और जाने देने पर प्रेम का नाश होता है, यदि कुछ कहूँ तो वह प्रभुता होती है और यदि कुछ नहीं कहूँ तो स्नेह दूर होता है। 

प्रियतम के बिना उसका जीना मुश्किल हो रहा है जिसका किसी को विश्वास नहीं होता है ऐसे में क्या कहूँ कोई हमें समझाए। विरहिणी गोपियाँ कहती हैं प्रियतम के बिना तड़पकर उन्हें जीना पड़ रहा है किसी को उनपर दया नहीं आती है। वे अपने प्रियतम के रूप की सुधा की प्यासी बनी पी-पी की रट लगा रही हैं, अब उनके अन्दर न जीने का हौसला है और न उत्साह। 

हरिश्चन्द्र कहते हैं कि अब तो जैसे उठने की स्थिति बन गई है। वे (गोपियाँ कहती हैं कि कोई है जो जाकर उन प्रियतम कृष्ण तक जाकर मेरी हालत का बयान करे। कवि हरिश्चन्द्र कहते हैं हे प्रभु ! आपको जगत दीनदयाल से संज्ञापित करता है फिर दीन के प्रति तुमने इतना स्नेह ही क्यों बढ़ाया, तुम्हें लोग करुणानिधि कहते हैं पर ऐसे नाम से संज्ञापित होकर भी आप वेदना देते हैं ऐसी रुखाई भला क्यों, हे प्रभु मुझे अपनाने की कृपा करो क्योंकि आपका ऐसा स्वभाव है तभी आपका ‘गरीब नेवाज’ सार्थक होगा।

भारतेन्दुकृत प्रेम माधुरी का सार

कवि हरिश्चन्द्र कहते हैं कि श्रीकृष्ण की छवि गोपियों की आँखों में सदा डोलती रहती है फिर भी आँखों को अपने प्रिय के दर्शन के बिना धैर्य नहीं, क्षण में ही वियोग पाकर उन्हें प्रलय जैसा आभास होने लगा है। पलक में डोलती हुई कृष्ण की छवि के बावजूद बिना देखे आँखें दुखती रहती हैं। कवि हरिश्चन्द्र कहते हैं कि ब्रह्म व्यापक है वह सर्वत्र व्याप्त है ऐसे प्रभु को गोपियाँ पहचानती हैं किन्तु नंदलाल के लिए वे हमेशा बेहाल रहती हैं उन्हें ज्ञान संतोष नहीं दे पाता है।

उद्धव ! उनसे ( श्री कृष्ण) से जाकर कहो कि हम कुछ नहीं जानती सिवाय इसके कि उनके देखे बिना आँखें दुखने लगी हैं। कवि हरिश्चन्द्र कहते हैं कि इस जगत में रहते हुए उन्हें (गोपियों को) उनके अतिरिक्त कोई सुख नहीं चाहिए क्योंकि उन्हें चैन का नाम चौंकाता है, सपने में भी भोग की ओर उनका ध्यान नहीं जाता है। हरिश्चन्द्र कहते हैं कि बिना प्रभु के सुन्दर मुख को देखे उससे नहीं रहा जा रहा है। 

विरहिणी गोपियाँ दुखिया हैं जो उड़कर कहीं उनके पास न चला जाय उनका दुःख। समग्रतः भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने विरहिणी की अन्तर्दशा की अभिव्यक्ति की है। यहाँ उनके सारे पद श्री कृष्ण-प्रेम से परिपूर्ण और आप्लावित है। यहाँ काव्य-भाषा के रूप में ब्रजभाषा व्यवहृत हुई है।

Leave a Comment