(2022) दुर्गापूजा (विजयादशमी) पर निबंध – Durga Pooja Par Lekh in Hindi

हम दशहरा बड़े ही धूम धाम से मनाते है। इस महापर्व का इंतजार हम बेसब्री से करते है। इसलिए आज के इस पोस्ट हम आपको दुर्गापूजा पर निबंध बताने वाले है। जो 600 शब्द से भी ज्यादा का है। इस लेख में हम विजयादशमी के बारे में विस्तार से चर्चा किया है। आशा है की ये लेख आपको बेहद पसंद आएगा।

दुर्गापूजा (विजयादशमी) पर निबंध – Durga Pooja Par Lekh in Hindi

Durga Pooja Par Lekh

भारतीय त्योहारों में दुर्गापूजा का अन्यतम स्थान है। यद्यपि यह पूर्वी भारत का प्रमुख उत्सव है तथापि विभिन्न रूपों में यह सारे भारत में मनाई जाती है। भारतवर्ष में शक्ति और ऐश्वर्य की पूजा अतिप्राचीनकाल से चली आ रही है। शास्त्रबल के साथ ही भारतवासियों ने शस्त्रबल को भी अधिक महत्त्व दिया है। दुर्गा को शक्ति का प्रतीक माना गया है। 

वेदों तथा उपनिषदों में शक्ति की अधिष्ठात्री देवी का उल्लेख मिलता है। ‘महाभारत’ में एक प्रसंग आता है जिसमें अर्जुन ने महाशक्ति का स्तवन किया है। मार्कण्डेय पुराण और देवी भागवत में महाशक्ति चंडिका का गौरवगान किया गया है। राम ने देवी से शक्ति प्राप्तकर अपराजेय रावण का बध किया। राम की इस विजय की स्मृति में ‘विजयादशमी’ का पर्व मनाया जाता है। 

राम ने दशशीश रावण को मारा था, इसलिए इस पर्व को ‘दशहरा’ भी कहा जाता है। दुर्गापूजा का पर्व आसुरी प्रवृत्तियों पर दैवी प्रवृत्तियों की विजय का पर्व है। दुर्गापूजा का महान पर्व लगातार दस दिनों तक मनाया जाता है। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को कलश-स्थापना होती है और उसी दिन से पूजा प्रारंभ हो जाती है। 

दुर्गा की प्रतिमा में सप्तमी को प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। उस दिन से नवमी तक माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना विधिपूर्वक की जाती है। सप्तमी से नवमी तक खूब चहल-पहल रहती है। देहातों की अपेक्षा शहरों में विशेष चहल-पहल रहती है। लोग झुंडों में मेला देखने जाते हैं। विभिन्न पूजा समितियों की ओर से इन तीन रातों में गीत, संगीत और नाटकों के विभिन्न रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

Essay on Durga Pooja in Hindi

मार्कण्डेय पुराण में देवी के तीन रूपों का उल्लेख है। ‘योगमाया’ विश्वस्रष्टा की शक्तिमयी विभूति हैं। यह देवी का प्रथम रूप है। देवी का दूसरा रूप ‘शक्तिरूपिणी’ का है और तीसरा रूप महाशक्तिधारिणी ‘नारीशक्ति’ का है। देवी के उपर्युक्त तीनों रूप बड़ेही उदत्त और भव्य हैं ।

दुर्गापूजा एक सांस्कृतिक पर्व है। इस पर्व को दिखावेबाजी में परिवर्तित नहीं करना चाहिए। शक्ति की आराधना के पर्व के रूप में इसे मनाना चाहिए। इस पर्व को आस्थापूर्वक शक्ति के आमंत्रण के साथ जोड़कर हमें अपने जीवन में आसुरी प्रवृत्ति से लड़ने की क्षमता प्राप्त करनी चाहिए। इस पर्व की सार्थकता इसी में है।

इस पर्व की कुछ हानियाँ भी हैं, जैसे – ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण.एवं चंदा उगाही द्वारा आर्थिक बोझ, आपराधिक एवं सांप्रदायिक दुर्घटनाएँ। आस्था, भक्ति, सादगी, पवित्रता, आत्मिक उल्लास और आध्यात्मिक उन्नयन के इस पर्व को वैभव प्रदर्शन से कभी दूषित नहीं करना चाहिए। हमारा यही संकल्प इस पर्व के सांस्कृतिक स्वरूप की रक्षा कर सकता है। 

इस पर्व का सांस्कृतिक रंग उड़ता जा रहा है, यह अत्यंत चिंता का विषय है। आएँ, हम सच्ची श्रद्धा से, शक्ति से अपने-अपने समाज और अपने राष्ट्र के कल्याण के लिए प्रार्थना करें। अपनी धरती और विश्व के मंगल के लिए अभ्यर्थना करें उस शक्ति की जो हमें असत से सत की ओर ले जाती है, जो हमारी निराशा की घड़ियों में आशा का दिव्य आलोक भरती है।

दशहरा पूजा का इंतजार खासकर हम बच्चे करते हैं। दशहरा शुरू होने से पहले ही हम अपने मित्रों के साथ रोजाना सुबह और शाम को मूर्ति देखने जाते हैं उनकी मूर्ति बनाने की प्रक्रिया बहुत पहले से ही शुरू कर दी जाती है उसके कारण हम सभी को जाना मां दुर्गा का दर्शन करने के लिए जाते हैं। 

दशहरा यानी कि दुर्गा पूजा का इंतजार महीनों से कर रहे होते हैं क्योंकि दशहरा में हम सभी गांव का मेला ले जाते हैं। मेला में दूर-दूर के दुकानदार आते हैं विभिन्न प्रकार के खिलौने और वस्तुओं का दुकान लगाते हैं मेरा आने पर हम खूब सारी खरीदारी करते हैं क्योंकि मेला में चीजें काफी सस्ती मिलती है।

हम अनेक प्रकार के खिलौने और मिठाई इत्यादिओं का आनंद उठा पाते हैं हम अपने दोस्तों के साथ अपने आसपास के गांव शहर के दशहरे मेला में घूमने जाते हैं और वहां खूब मजे करते हैं। दशहरा शुरू होते ही हमें विद्यालय में भी छुट्टी मिल जाती है जिसके कारण हम और भी आनंद उठा पाते हैं सभी दोस्त मिलकर खूब मजे करते हैं खूब सारी मिठाईयां खाते हैं और अनेक प्रकार के खिलौने और वस्तुओं को खरीद कर लाते हैं। 

मेला देखने के लिए हमें घर पर अपने भरोसे पैसे मिलते हैं उन्हें पैसों को हम मेला में खर्च करते हैं काफी बार तो ऐसा होता है कि हम दशहरा मेला के लिए बहुत पहले से पैसे जमा कर रहे होते हैं और अपने दोस्तों के साथ उन पैसों से हम खूब सारी चीजें खाते हैं।

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